Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 13 Mar 2026, 11:49 PM IST
Taj News Opinion Desk
विशेष राजनीतिक आलेख
बादल सरोज
संपादक, ‘लोकजतन’
संयुक्त सचिव, अखिल भारतीय किसान सभा
‘लोकजतन’ के संपादक और किसान नेता बादल सरोज ने अपने इस बेहद प्रखर आलेख में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अमरीकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के भाषण का तीखा विश्लेषण किया है। उन्होंने बताया है कि कैसे अमरीका फिर से दुनिया को पश्चिमी साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद की बेड़ियों में जकड़ने की खौफनाक पटकथा लिख रहा है। पढ़िए उनका यह विचारोत्तेजक आलेख:
मुख्य बिंदु
- म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अमरीकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का दुनिया को फिर से गुलाम बनाने का नया ‘मंसूबा’।
- द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मिली आजादी और संप्रभुता को गलत ठहराते हुए खुलेआम पश्चिमी वर्चस्व की वकालत।
- सैमुअल हंटिंगटन के ‘सभ्यताओं के टकराव’ सिद्धांत की तर्ज पर पूरी दुनिया के खिलाफ अमरीका का नया युद्धनाद।
- रुबियो की साम्राज्यवादी धमकियों पर भारत सरकार, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और आरएसएस की रहस्यमयी चुप्पी पर कड़े सवाल।
घटनाओं को उनके संदर्भ से काटकर देखना एक बहुत बड़ी दुर्घटना है। हमें उन्हें हमेशा एक परिघटना के अहम हिस्से के रूप में देखना चाहिए। तभी हम उन्हें ठीक-ठीक समझ सकते हैं। सरल भाषा में कहें तो सिर्फ बाहरी रूप निहारने से असलियत उजागर नहीं होती है। समग्रता हमेशा उसके गहरे सार में ही होती है। यह बात हमारे सामान्य जीवन के लिए बिल्कुल सच है। इसके अलावा राजनीतिक और सामाजिक विकास के मामले में यह और भी ज्यादा सटीक बैठती है। हम इसका थोड़ा और विस्तार आसानी से कर सकते हैं। कारनामों को सिर्फ कुछ खास व्यक्तियों की सनक मान लेना सही नहीं है। मूलतः वे एक ख़ास रुझान, दिशा और छिपे हुए उद्देश्य की मजबूत अभिव्यक्ति होती हैं。
आज अमरीका ने ईरान पर एक भयानक युद्ध थोप दिया है। गज़ा में लगातार महिलाओं और बच्चों का नरसंहार जारी है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति का उनकी पत्नी सहित आपराधिक अपहरण हुआ है। अमरीका पूरी दुनिया भर के खिलाफ एक नया टैरिफ युद्ध छेड़ रहा है। वह सभी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और संयुक्त राष्ट्र संघ को खुलेआम ठेंगा दिखा रहा है। अमरीका आज भारत जैसे बड़े देश का बार-बार सार्वजनिक अपमान कर रहा है। हमें इन सभी घटनाओं को इसी विशेष नजरिए से गहराई से पढ़ना चाहिए। यह सिर्फ डोनाल्ड ट्रम्प की कोई व्यक्तिगत सनक बिल्कुल नहीं है। वास्तव में यह दुनिया को फिर से गुलाम बनाने की एक बहुत भयानक परियोजना है। ट्रम्प प्रशासन इसी परियोजना की एक नई पटकथा लिख रहा है。
वह नई दुनिया आखिर कैसी होगी? इस कुटिल योजना का पूरा ब्लूप्रिंट ट्रम्प के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने 14 फरवरी को रखा। उन्होंने म्यूनिख में हुए सुरक्षा सम्मेलन (Security Conference) में यह खतरनाक खाका पेश किया। इसे रखते समय रुबियो ने अपनी बात को बहुत आक्रामक तरह से दोहराया। उन्होंने कहा कि सेनाएं कभी अमूर्त धारणाओं के लिए नहीं लड़ती हैं। सेनाएं हमेशा एक जनसमूह के लिए मजबूती से लड़ती हैं। सेनाएं अपने राष्ट्र के लिए लड़ती हैं। सेनाएं अपनी जीवन-पद्धति बचाने के लिए लड़ती हैं। उन्होंने आगे कहा कि हम आज इसी की रक्षा कर रहे हैं। हम एक महान सभ्यता को बचा रहे हैं। इस सभ्यता के पास अपने इतिहास पर गर्व करने का पूरा अधिकार है। जो सदैव अपनी आर्थिक और राजनीतिक नियति की खुद मालिक बने रहने का दृढ़ संकल्प रखती है。
ट्रम्प के विदेश मंत्री ने जिस महान सभ्यता की बहाली की कड़ी पैरवी की, उसी ने बिना पलक झपकाए उसका पूरा खाका भी दुनिया के सामने रखा। उसका सीधा सार यह है कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के गुलाम देशों का आजाद होना पूरी तरह गलत था। उपनिवेशवाद का खात्मा होना पश्चिम की एक भारी भूल थी। बड़े-बड़े लोककल्याणकारी राज्यों का गठन होना भी गलत था। लोकतंत्र और अन्य देशों की संप्रभुता की समझदारी का विकसित होना पूरी तरह गलत था। विश्व मानवता एक समान है, यह विचार भी उनके अनुसार गलत धारणा है। हरेक व्यक्ति का सम्मान ही वैश्विक सभ्यता की पहचान है, वे इसे भी नहीं मानते हैं। उनके अनुसार इन सबको अब पूरी तरह उलटा जाना चाहिए। पृथ्वी के पर्यावरण आदि की रक्षा की बात करना सिर्फ एक तरह का ‘कल्ट’ है। हमें इसके चक्कर में बिल्कुल नहीं आना चाहिए। बिना किसी लाग-लपेट के रुबियो ने गोरों की सर्वोच्चता (White Supremacy) की गौरवगाथा का खुलकर गान किया। उन्होंने उसी महान सभ्यता को फिर से वापस लाने के अपने संकल्प का सीधा एलान कर दिया。
रुबियो ने अपने भड़काऊ शब्दों में कहा कि द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति से पहले पांच शताब्दियों तक पश्चिमी जगत लगातार फैलता रहा था। उसके मिशनरी, उसके तीर्थयात्री, उसके सैनिक और उसके खोजकर्ता अपने तटों से निकलकर महासागरों को पार करते रहे। वे नए महाद्वीपों में लगातार बसते रहे। उन्होंने दुनिया भर में अपने विशाल साम्राज्य खड़े किए। लेकिन 1945 में कोलंबस के युग के बाद पहली बार यह भारी विस्तार सिमटने लगा। यूरोप उस समय पूरी तरह तबाह हो चुका था। उसका आधा भाग लौह आवरण के पीछे अपना जीवन बिता रहा था। शेष भाग भी मानो उसी दिशा में आगे बढ़ता हुआ दिखाई देता था। महान पश्चिमी साम्राज्य अपने पतन के अंतिम दौर में प्रवेश कर चुके थे। ईश्वरविहीन साम्यवादी क्रांतियों और उपनिवेशविरोधी विद्रोहों ने इस पतन की प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया। जिसने आने वाले वर्षों में विश्व का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने मानचित्र के विशाल हिस्सों को हंसिया-हथौड़ा वाले लाल झंडों से पूरी तरह ढंक दिया। उसने साफ कहा कि अमरीका अब इस दुनिया को फिर से द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले की दुनिया बनाने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ है。
अमरीका नई सदी को एक बार फिर दुनिया भर पर पश्चिमी वर्चस्व वाली सदी बनाना चाहता है। इतिहास को उलटने की इस डरावनी परियोजना में भागीदारी के लिए उसने यूरोप को खुला न्यौता दिया। उसने यूरोपीयों के साथ अपनी पुरानी रिश्तेदारी भी खोज निकाली। उसने अमरीका को ‘खोजने’ वाले कोलंबस का सम्मान किया। उसके बाद समय-समय पर अमरीकी मूल निवासियों के भयानक नरसंहार कर पूरे महाद्वीप पर कब्जा करने वाले अलग-अलग यूरोपीय देशों का नाम भी लिया। उसने उन सबके प्रति अपना आभार जताया। यूरोप को लुभाते हुए रुबियो ने कहा कि हम अमेरिकियों के लिए हमारा घर भले ही पश्चिमी गोलार्ध में हो। लेकिन हम हमेशा यूरोप की ही संतान रहेंगे। अमेरिका और यूरोप हमेशा एक-दूसरे के पूरक हैं। हम एक ही सभ्यता यानी पश्चिमी सभ्यता का अहम हिस्सा हैं। हम उन सबसे गहरे बंधनों से एक-दूसरे से मजबूती से जुड़े हैं, जो राष्ट्र साझा कर सकते हैं। हम सदियों के साझा इतिहास, ईसाई धर्म, संस्कृति, विरासत, भाषा और वंश से जुड़े हैं। हम उन बलिदानों से निर्मित बंधन से जुड़े हैं, जो हमारे पुरखों ने उस साझा सभ्यता के लिए दिए थे। हम आध्यात्मिक रूप से और सांस्कृतिक रूप से भी एक दूसरे से परस्पर जुड़े हुए हैं。
जिस यूरोप को डोनाल्ड ट्रम्प लगातार लज्जित करते रहते हैं, उसे दिया जा रहा यह निमंत्रण भी बिना किसी धमकी के नहीं था। रुबियो ने साफ़-साफ़ शब्दों में अपनी बात कही। राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका एक बार फिर नवीनीकरण और पुनर्स्थापना का कार्य खुद संभालेगा। यह एक ऐसे भविष्य के दृष्टिकोण से प्रेरित होगा, जो हमारी अतीत की सभ्यता की तरह ही गौरवशाली और जीवंत हो। यदि आवश्यक हुआ, तो हम इस बड़े काम को अकेले करने के लिए भी पूरी तरह तैयार हैं। लेकिन हमारी प्राथमिकता और हमारी आशा यही है कि हम इसे आपके साथ मिलकर करें। मतलब यूरोप भी आये या न आये, अमरीका तो अपनी मनमानी करके ही मानेगा। उसने साफ़ एलान किया कि दुनिया के संसाधनों पर अमरीका का ही कब्जा होना चाहिए। विशेषकर जिसे ‘वैश्विक दक्षिण’ (Global South) कहा जाता है। जिन्हें सदियों तक गोरों ने अपना गुलाम बनाकर बुरी तरह लूटा था। उसके सारे संसाधनों पर राजी या गैर-राजी अमरीका का ही एकाधिकार होना चाहिए。
यह सिर्फ किसी गुंडे की भाषा नहीं है। यह पूरी दुनिया को अपने अधीन बनाने का एक बहुत शैतानी और खतरनाक विचार है। इस सबकी बड़ी वजह भी रुबियो ने खुद मानी। जिस वैश्वीकरण की आर्थिक प्रणाली को खुद उसने विश्व बैंक, आईएमएफ और विश्व व्यापार संगठन के जरिये दुनिया पर थोपा था। उसने आज उसकी विफलता को खुलेआम स्वीकार किया। उसने उसे अपनी एक बड़ी गलती बताया। यह गलती अब फिर से गुलामी और नए रूप का उपनिवेशवाद लाकर ही सुधारी जानी है। इस नई गुलामी के अलावा ट्रम्प की अगुआई में जिस महान सभ्यता की बहाली की बात रुबियो ने की, वह कैसी होगी? इसका उदाहरण दुनिया देख रही है। पिछली दो साल से अधिक समय से गज़ा में लगातार बच्चों और महिलाओं सहित नागरिक आबादी का भीषण नरसंहार हो रहा है। ईरान पर ताजे हमले की शुरुआत 28 फरवरी 2026 को की गई। वहाँ लड़कियों के स्कूल पर बम फोड़कर 153 से अधिक मासूम बच्चियों की निर्मम ह्त्या की गई। जिस ‘आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महानता’ की आज दुहाई दी जा रही है, वह कितनी घिनौनी है। यह अब तक जारी 35 लाख एप्सटीन फाइलों में पूरी दुनिया अच्छी तरह देख चुकी है। अभी न जाने कितनी लाख और गंदी फाइलों में यह सब देखना बाकी है。
ध्यान दें, अमरीकी विदेश मंत्री म्यूनिख में जो कुछ भी कह रहा था, उसमे नया कुछ भी नहीं है। सैमुअल हंटिंगटन इसे ‘सभ्यताओं के टकराव’ (The Clash of Civilizations) के अपने कुख्यात सिद्धांत में तीस साल पहले ही दे चुके हैं। हंटिंगटन का यह दावा था कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अब दुनिया में संघर्ष का मुख्य कारण सिर्फ सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान होगी। उसका यह पक्का मानना था कि भविष्य के युद्ध अब देशों के बीच नहीं होंगे। बल्कि ये युद्ध अलग-अलग सभ्यताओं के बीच लड़े जाएंगे। पश्चिमी सभ्यता को सबसे अधिक विकसित और आदर्श बताते हुए हंटिंगटन ने उसका टकराव 7 अन्य ‘सभ्यताओं’ से बताया था। उसने उनमें इस्लामिक, चीनी, हिन्दू, ऑर्थोडॉक्स रूसी, जापानी, लैटिन अमेरिकी और अफ्रीकी सभ्यताओं को मुख्य रूप से शामिल किया था। मतलब जिस पश्चिमी वर्चस्व वाली दुनिया की बहाली का आज ख्वाब देखा जा रहा है। वह दुनिया की बाकी सभी पुरानी सभ्यताओं के बिल्कुल खिलाफ है। एक ऐसे देश, जिसकी कुल उम्र मात्र 250 बरस की है। उस अमरीका का विदेश मंत्री बिना हंटिंगटन का नाम लिए ही बाकी सभी सभ्यताओं के साथ टकराव को भयंकर युद्ध तक पहुंचाने का खुला एलान कर रहा है。
सनद रहे कि जिस 1945 के महायुद्ध के बाद बनी दुनिया पर आज स्यापा किया जा रहा है। वह दुनिया हिटलर के नाजी श्रेष्ठता के कुख्यात वहम को पूरी तरह पराजित करके कायम हुई थी। वह नाजीवाद इसी का सबसे भौंड़ा और बेहद नृशंस पूर्व अवतार था। इसकी भारी कीमत उस समय की दुनिया को 5 करोड़ इंसानों की दर्दनाक मौत से चुकानी पड़ी थी। अब एक नयी तिथि और नए दस्तखत के साथ मौत का वही पुराना परवाना लेकर ट्रम्प का अमरीका फिर से आया है। रुबियो का यह ‘म्यूनिख घोषणापत्र’ एक तरह से ‘ईसाई पश्चिम’ की कथित सभ्यतानुरूप एकता की एक खुली घोषणा है। यह सिर्फ ‘नास्तिक कम्युनिस्टों’ के खिलाफ ही नहीं है। बल्कि यह वैश्विक दक्षिण के ‘उपनिवेशवाद-विरोधी’ करोड़ों लोगों के खिलाफ भी एक सीधा आह्वान है। इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। कम-से-कम चर्चिल के बाद तो एक भी पश्चिमी नेता ऐसा नहीं हुआ है। जिसने यूरोपीय उपनिवेशवाद के अंत पर इस तरह मंच से खुलकर अफ़सोस जताया हो। पड़ोसी क्यूबा और वेनेजुएला से लेकर मध्य में यूरोप और पश्चिम एशिया तक अमेरिका अपना दबाव बना रहा है। यूरेशिया के पार सुदूर पूर्व तक, संयुक्त राज्य अमेरिका अपना प्रभुत्व बनाए रखने का आक्रामक प्रयास कर रहा है। रुबियो का यूरोप को दिया गया यह आश्वासन हाल ही में यूरोपीय चिंताओं के मद्देनजर आया है। उन्हें डर लगता है कि ट्रंप ‘अमरीका को पुनः महान बनाने’ के अंध समर्थन में उन्हें भी दरकिनार कर सकते हैं। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि उन्हें वहां खड़े होकर ज़ोरदार तालियाँ मिलीं。
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब भारत सहित दुनिया के 100 से भी अधिक देशों के महान स्वतत्रता संग्रामों को गलत बताया जा रहा था। जब उनकी मुश्किल से हासिल की गई आजादी को नुकसानदेह बताकर दोबारा से उसी तरह का खौफनाक साम्राज्य कायम करने की घोषणा की जा रही थी। तब ‘वन्दे मातरम्’ के नाम पर कथित राष्ट्रीय गौरव की दुहाई देने वाली भारत की सरकार आखिर क्या कर रही थी? आत्मनिर्भरता का जाप करने वाली और अपने मुंह मियाँ ‘विश्वगुरु’ बनने का बड़ा दावा करने वाली सरकार चुप क्यों थी? म्युनिख में मार्को रुबियो को सुनने बैठे भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर वहां क्या कर रहे थे? जब रुबियो इन सब कूटनीतिक बदतमीजियों और अमानवीय इरादों की बकवास कर रहा था। जब वह रूस के तेल पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने का सीधा जिक्र कर रहा था। वह भारत द्वारा अतिरिक्त रूसी तेल की खरीद बंद करने को सरेआम अपनी एक बड़ी उपलब्धि के रूप में गिना रहा था। तब ठीक उसी सभागार में बैठे भारत के विदेश मंत्री ने उसके जवाब में क्या कहा? उन्होंने सिर्फ भारत-अमरीकी व्यापार समझौतों का मीठा गुणगान किया। उन्होंने यूरोपीय देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों की खूब बड़ाई की। मगर दुनिया के खिलाफ जंग के रुबियो की इस यलगार पर वे कुछ भी नहीं बोले。
वे ट्रम्प की घुड़कियो के आगे पूरी तरह मुसक्का मारे बैठे रहे। उसकी नाराजगी के डर से भारत के सदियों से पुराने मित्र ईरान के सर्वोच्च नेता की मौत पर औपचारिक श्रद्धांजलि देने से भी हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बचते रहे। वे भी उनकी तरह चुपचाप सब कुछ सुनते रहे। सरकार नहीं बोली तो नहीं बोली, उसकी सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी भी कुछ नहीं बोली। यहाँ तक कि बात-बेबात पर बोलने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने भी अपनी जुबान बिल्कुल नहीं खोली। जो संघ अगली सदी को हिन्दुओं की सदी होने का ख़म ठोंकता है, वह भी खामोश रहा। ऐसा बिल्कुल अकारण नहीं है। यह भाजपा जिसकी राजनीतिक भुजा है, वह उस संघ की परम्परा का ही एक हिस्सा है। एक तो इसलिए कि ट्रम्प का अमरीका जिस आर्थिक-राजनीतिक गुलामी वाले अतीत की बहाली चाहता है। वह यूरोप के नाम पर गोरों की श्रेष्ठता के नाम पर जिस नस्लवादी राह पर चलने के मंसूबे साध रहा है। आरएसएस भी भारत के पैमाने पर ठीक उसी तरह की एक आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था की बहाली के सपने हमेशा देखती है। दूसरे इसलिए कि जिन राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों को मंच से कोसा जा रहा था, उनके साथ संघ का कभी कोई रिश्ता तक नहीं रहा है。
उस दौरान दुनिया के अनेक देशों में चल रहे मुक्ति संघर्षों के प्रति सहानुभूति दिखाना तो बहुत दूर की बात थी। वे जिस देश में थे, उस भारत की आजादी की लड़ाई में भी वे पूरे तन-मन से हमेशा अंग्रेजो के साथ ही खड़े रहे। रुबियो उसी पुराने राज की तो पुनर्स्थापना का दावा कर रहे हैं। सो उन्हें भला कोई आपत्ति कैसी हो सकती है! वैसे भी इन दिनों अमरीकी साम्राज्यवाद ही उनका नया अंग्रेज है। वही उनका नया आराध्य बन चुका है। उसकी नजरो में हमेशा अच्छा दिखने के लिए अपने आप को सांस्कृतिक संगठन बताने वाला आरएसएस भारत-अमरीकी आर्थिक गठबंधन को महत्वपूर्ण बताता रहता है। वे करोड़ों रूपये खर्च करके अमेरिका में अपनी छवि सुधारने के लिए अमेरिकी लॉबिंग कम्पनी ‘स्क्वॉयर पैटन बोग्स’ (एसपीबी) की सेवा लेने में भी नहीं हिचकते हैं। जिसे बाद में पोल खुलने के बाद बंद कर दिया गया था। जो वास्तव में पाकिस्तान के लिए लॉबिंग करने वाली आधिकारिक इकाईयों में से एक है। यही संघ का असली और नंगा चेहरा है। वैश्विक राजनीति का उसका यही एक मनुवादी भाष्य है। जिन्हें अपने से कमजोर मानते है, उनको हमेशा दबाना। और जिन्हें अपने से ताकतवर समझते हैं, उनके अधीनस्थ रहने को अपना परम सौभाग्य समझना। अमरीका के आगे यह कायरतापूर्ण चुप्पी इसी का सीधा नतीजा है。
मगर भारत सिर्फ उसकी मौजूदा सरकार नहीं है। भारत सिर्फ उस सरकार का असंवैधानिक नियंत्रणकर्ता आरएसएस बिल्कुल नही है। भारत वह डेढ़ अरब की विशाल आबादी वाला एक महान देश है। जिसके पुरखों ने करीब दो सौ साल तक ब्रिटिश गुलामी के खिलाफ एक शानदार लड़ाई लड़ी और जीती थी। जो अंग्रेजों के साथ-साथ खतरनाक पुर्तगालियों और फ्रांसीसियों के आधिपत्य से भी बहादुरी से लडे और जीते। जिन्होंने लोकतंत्र और समता, कल्याणकारी राज्य की बेहतरीन अवधारणा और हर तरह के नस्लवाद-रंगभेदवाद का कड़ा विरोध खुद अपने अनुभवों से सीखा। उन्होंने इसे अपने अनुल्लंघनीय व्यवहार का हिस्सा बनाया। यह पूरी तरह तय है कि भारत का वह आम अवाम मार्को रुबियो के ‘म्यूनिख घोषणापत्र’ में दर्ज इस इतिहास उलटने के खतरनाक इरादों को अच्छी तरह समझेगा। और वह इन साम्राज्यवादी मंसूबों का कड़ा विरोध अपने मुक्ति संघर्षो के एजेंडे का अहम हिस्सा जरूर बनाएगा。
Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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