Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 13 Mar 2026, 12:45 am IST
Taj News Foreign Policy Desk
विशेष कूटनीतिक विश्लेषण
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल ने अपने इस विशेष कूटनीतिक आलेख में वैश्विक अस्थिरता के बीच भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का बहुत सटीक विश्लेषण किया है। उन्होंने बताया है कि कैसे विदेश मंत्री एस. जयशंकर अपनी सधी हुई मुस्कान और ‘उदासीन’ शैली से दुनिया के बड़े देशों को कड़ा संदेश दे रहे हैं। पढ़िए उनका यह बेबाक आलेख:
मुख्य बिंदु
- वैश्विक अस्थिरता और ईरान-अमेरिका संकट के बीच भारत का ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ वाला स्वतंत्र रास्ता।
- विदेश मंत्री एस. जयशंकर की सोची-समझी अस्पष्टता और ‘नॉनचलेंस’ (उदासीन) रवैये का कूटनीतिक प्रभाव।
- अमेरिका से इंडो-पैसिफिक सहयोग, ईरान से तेल सुरक्षा और रूस से पुरानी दोस्ती का बेहतरीन संतुलन।
- भारत अब किसी का जूनियर पार्टनर नहीं; दुनिया की नई ‘स्विंग पावर’ के रूप में उभरता नया भारत।
भारत की राजधानी दिल्ली आज भी एक गहरी धुंध की चादर ओढ़े चुपचाप खड़ी है। ठीक इसी तरह वैश्विक अस्थिरता के इस बेहद खतरनाक दौर में भारत की विदेश नीति भी काम कर रही है। पूरी दुनिया इस समय भारी बेचैनी से घिरी हुई है। दुनिया के तमाम बड़े देश लगातार भारत से एक अहम सवाल पूछ रहे हैं। उनका सवाल है कि भारत आखिर इस युद्ध में किसके साथ खड़ा है? क्या भारत वॉशिंगटन के साथ है? क्या वह मॉस्को के साथ खड़ा है? क्या भारत तेहरान का समर्थन कर रहा है? या फिर वह किसी के साथ भी बिल्कुल नहीं है? इन सारे सवालों पर दिल्ली पूरी तरह चुप है। और असल में यही खामोश चुप्पी दुनिया के लिए सबसे स्पष्ट और शक्तिशाली जवाब है।
आज की दुनिया सच में एक बहुत ही अजीब और खतरनाक मोड़ पर खड़ी है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी अब बिल्कुल मौसम की तरह रोज बदल रही है। हर शक्तिशाली देश अपना एक नया ब्लॉक बना रहा है। वे दुनिया में नई सामरिक धुरियाँ खड़ी कर रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच भारत ने एक बिल्कुल अलग और स्वतंत्र रास्ता चुना है। भारत का कूटनीतिक नारा बहुत ही सरल है। वह नारा ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का है। लेकिन इस लक्ष्य को पाने का रास्ता बेहद जटिल और सूक्ष्म है। इस मुश्किल रास्ते के मुख्य शिल्पकार हमारे विदेश मंत्री एस. जयशंकर हैं। उनकी कूटनीति में कोई फालतू शोर-शराबा बिल्कुल नहीं होता है। वे अपनी नीतियों के लिए कभी ढोल-नगाड़े नहीं बजाते हैं। उनकी कूटनीति में सार्वजनिक घोषणाएँ बहुत कम होती हैं। लेकिन उनकी राजनीतिक चालें हमेशा बहुत गहरी और दूरगामी होती हैं।
उनकी सफल रणनीति के कुछ प्रमुख शब्द पूरी दुनिया में मशहूर हैं। इनमें रणनीतिक स्वायत्तता, बहुध्रुवीय संबंध, सोची-समझी अस्पष्टता और जानबूझकर साधी गई चुप्पी प्रमुख हैं। इसके अलावा दिल्ली की एक खास कूटनीतिक शैली है। इसे “नॉनचलेंस” यानी एक बेपरवाही भरा उदासीन रवैया कहा जाता है। जब पूरी दुनिया चीखती और चिल्लाती है, तब दिल्ली बस अपने कंधे उचका कर आगे बढ़ जाती है। आपको याद होगा कि कुछ साल पहले विदेश मंत्री जयशंकर ने एक ऐतिहासिक वाक्य कहा था। उन्होंने बहुत शांत स्वर में वह बात कही थी। लेकिन उस एक छोटे से वाक्य की गूंज बहुत दूर तक गई थी। उन्होंने कहा था कि “यूरोप की मुसीबतें पूरी दुनिया की मुसीबतें बिल्कुल नहीं हैं।” इस एक छोटी सी पंक्ति ने पश्चिम की कई राजधानियों में भारी हलचल मचा दी थी। उनका संदेश एकदम साफ और कड़ा था। उन्होंने बता दिया कि भारत अब किसी भी देश का जूनियर पार्टनर बिल्कुल नहीं रहा है। भारत अब न तो किसी के खोखले नैतिक उपदेश सुनने को तैयार है। और न ही वह किसी भी महाशक्ति के भारी दबाव में आने वाला है।
अब हम देखते हैं कि पश्चिम एशिया में एक बिल्कुल नया और भयानक संकट मंडरा रहा है। इस युद्ध में अमेरिका और इज़राइल एक तरफ मजबूती से खड़े हैं। जबकि ईरान उनके खिलाफ दूसरी तरफ खड़ा है। फरवरी 2026 के अंत से शुरू हुआ यह हिंसक दौर अब और भी ज्यादा तीव्र हो चुका है। रणनीतिक रूप से अहम हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर तनाव चरम पर है। दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर एक बहुत बड़ा खतरा पैदा हो गया है। दुनिया के तमाम रणनीतिकार अब नक्शे पर नई लकीरें खींच रहे हैं। रोज़ाना टीवी चैनलों पर गरमागरम बहसें चल रही हैं। लेकिन हर जगह सवाल वही पुराना है। आखिर इस संकट में भारत किसके साथ खड़ा है? इस अहम सवाल का जवाब हमारी ‘रणनीतिक अस्पष्टता’ है। दरअसल यह कोई कूटनीतिक दुर्बलता या अनिर्णय की स्थिति बिल्कुल नहीं है। बल्कि यह कूटनीति की एक बेहद परिपक्व और शानदार कला है।
आप जरा वर्तमान भू-राजनीतिक तस्वीर को ध्यान से देखिए। एक तरफ भारत के अमेरिका के साथ बहुत गहरे और मजबूत आर्थिक रिश्ते हैं। अमेरिका के टेक्सास में अरबों डॉलर की विशाल भारतीय परियोजनाएँ चल रही हैं। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भी दोनों देशों का रणनीतिक सहयोग बढ़ रहा है। दोनों के बीच भारी राजनीतिक गर्मजोशी साफ दिखाई देती है। वहीं दूसरी तरफ ईरान के साथ भी भारत की बहुत व्यावहारिक बातचीत लगातार चल रही है। भारत को अपनी तेल आपूर्ति सुनिश्चित करनी है। उसे हॉर्मुज़ से अपने व्यापारिक जहाज़ों को सुरक्षित गुजारना है। ऊर्जा सुरक्षा की यह गणित भारत के लिए बहुत अहम है। इसी कारण 10 मार्च 2026 को जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री से बहुत विस्तृत बातचीत की है। तीसरी तरफ रूस हमारा सबसे पुराना और भरोसेमंद साथी है। युद्ध के भारी दबाव के बावजूद भारत ने रूस से लगातार सस्ता तेल खरीदा है। दोनों देशों के बीच रक्षा सौदे आज भी बहुत मजबूत हैं। इसी कड़ी में 11-12 मार्च को रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से भी भारत की अहम बातचीत हुई है।
अब सवाल उठता है कि चीन का क्या रुख है? हमारी सीमा पर चीन के साथ लगातार तनाव बना हुआ है। दोनों देशों के सैनिक आज भी आमने-सामने खड़े हैं। लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार का रास्ता बिल्कुल बंद नहीं हुआ है। कूटनीतिक स्तर पर लगातार बातचीत जारी है। वास्तव में यही भारत की आधुनिक विदेश नीति का सबसे व्यावहारिक चेहरा है। भारत ने सभी गुटों से एक समान दूरी बना रखी है। वह बिना किसी के प्रति पूरी निष्ठा जताए अपना काम कर रहा है। वह किसी से पूरी दुश्मनी भी मोल नहीं ले रहा है। भारत ने अपने सारे कार्ड अपनी जेब में सुरक्षित रखे हैं। वह उन्हें बातचीत की मेज़ पर बिल्कुल नहीं दिखाता है। चाणक्य का वह पुराना सिद्धांत आज फिर से पूरी तरह जीवित हो उठा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कभी स्थायी दोस्त नहीं होते हैं। वहां सिर्फ अपने स्थायी राष्ट्रीय हित ही सर्वोपरि होते हैं।
दुनिया के बड़े मंचों पर नैतिकता की बातें करना हमेशा बहुत अच्छा लगता है। लेकिन युद्धों का पुराना इतिहास हमें कुछ और ही कड़वा सच बताता है। असल में कोई भी देश अंत में कोई जंग पूरी तरह नहीं जीतता है। युद्ध सिर्फ भयानक बर्बादी, इमारतों का मलबा और गहरी नफरत छोड़ जाता है। यह पीढ़ियों तक एक लंबी असुरक्षा छोड़ जाता है। इसलिए दिल्ली आज बहुत ज्यादा सतर्क है। 9 मार्च 2026 को संसद में जयशंकर ने पश्चिम एशिया की स्थिति पर एक अहम बयान दिया था। उन्होंने शांति, संवाद, कूटनीति और अवरोधन की पुरजोर वकालत की। उन्होंने सभी देशों से संयम बरतने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की। उन्होंने भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को ही अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बताई। हालांकि देश के भीतर बैठा विपक्ष अक्सर सरकार पर सवाल उठाता रहता है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी बार-बार कहते हैं कि सरकार को अपना “साफ स्टैंड” लेना चाहिए।
लेकिन विपक्ष को यह समझना होगा कि विदेश नीति कोई शाम की टीवी डिबेट बिल्कुल नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का असली खेल हमेशा बंद कमरों में ही होता है। खुफिया रिपोर्ट्स, बैक-चैनल बातचीत और गुप्त समझौते ही सबसे ज्यादा मायने रखते हैं। जो चीज़ें दुनिया को दिखाई नहीं देती हैं, असल में वही सबसे ज्यादा निर्णायक साबित होती हैं। विदेश मंत्री जयशंकर इस कूटनीतिक खेल के सबसे बड़े माहिर खिलाड़ी हैं। वे हमेशा मुस्कुराते हैं और बहुत धीरे बोलते हैं। लेकिन उनका संदेश हमेशा बेहद कड़ा और स्पष्ट होता है। अभी हाल ही में रायसीना डायलॉग 2026 में उन्होंने एक बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा कि भारत का वैश्विक उदय सिर्फ भारत ही तय करेगा। भारत अपनी खुद की ताकत से आगे बढ़ेगा। वह दूसरों की गलतियों के सहारे बिल्कुल आगे नहीं बढ़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि दुनिया में अब बहुध्रुवीयता पूरी तरह स्थायी हो चुकी है। अब दुनिया की कोई एक महाशक्ति सब कुछ अकेले तय नहीं कर सकती है।
इस भारी वैश्विक उथल-पुथल के बीच भी भारत ने अपने सभी हित पूरी तरह सुरक्षित रखे हैं। देश की ऊर्जा आपूर्ति लगातार जारी है। दुनिया भर के साथ हमारा व्यापार तेजी से बढ़ रहा है। विदेशों में रहने वाले सभी भारतीय नागरिक पूरी तरह सुरक्षित हैं। भारत पर पश्चिमी देशों का कोई बड़ा आर्थिक प्रतिबंध नहीं लगा है। देश के सामने कोई गंभीर आर्थिक संकट भी मौजूद नहीं है। हालांकि यह कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना बिल्कुल आसान काम नहीं है। इसके लिए सरकार को निरंतर सतर्कता बरतनी पड़ती है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के बड़े विश्लेषक अब भारत को एक “स्विंग पावर” कहने लगे हैं। भारत अब दुनिया की किसी एक धुरी में बिल्कुल बंधा हुआ नहीं है। लेकिन उसके पास दुनिया की हर धुरी को प्रभावित करने की पूरी क्षमता मौजूद है। असल में यही आज के नये भारत की नई भारतीय कूटनीति है। इस नीति में खोखले नारे बहुत कम हैं, लेकिन रणनीतिक गणित बहुत ज्यादा है। इसमें भावनाएँ कम हैं, और राष्ट्रीय हित सबसे ज्यादा हैं। आज जब पूरी दुनिया अलग-अलग ब्लॉक बना रही है। तब भारत अपने लिए नए स्वतंत्र रास्ते बना रहा है। धुंध में खड़ी दिल्ली आज पूरी दुनिया को एक बहुत साफ संदेश दे रही है। वह स्वतंत्र है, वह व्यावहारिक है और वह पूरी तरह निर्भीक है। भारत अपना रास्ता अब खुद बनाएगा, और वह भी सिर्फ अपनी शर्तों पर ही बनाएगा।
Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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