
Opinion Desk, Taj News आलेख: बृज खंडेलवाल | Reported by: Thakur Pawan Singh | Updated: Sun, 15 Feb 2026 08:15 AM IST
“क्या हमारे थाने इंसाफ़ के दरवाज़े हैं, या डर की दहलीज़? जब एक आम आदमी किसी मुसीबत में थाने की ओर बढ़ता है, तो क्या उसके कदमों में भरोसा होता है या दिल में खौफ़? पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल का यह बेबाक आलेख जो पुलिस व्यवस्था को आईना दिखाता है…”

बृज खंडेलवाल (Brij Khandelwal)
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक
⚖️ आलेख के मुख्य बिंदु
- 📹 खराब कैमरे: हिरासत में मारपीट के वक्त अक्सर सीसीटीवी ‘खराब’ क्यों हो जाते हैं?
- 🔫 एनकाउंटर संस्कृति: आरोपियों को ‘लंगड़ा’ बनाना न्याय है या शॉर्टकट?
- 🏛️ पुलिस राज्य: न्यायिक प्रक्रिया में पुलिस का हस्तक्षेप लोकतंत्र के लिए खतरा है।

अदालत की तल्ख़ी और जनता का डर
उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत की भाषा में जो तल्ख़ी और चिंता झलकी, वह केवल कानूनी टिप्पणी नहीं थी, बल्कि पूरी व्यवस्था को आईना दिखाने की कोशिश थी। जनता जानना चाहती है कि क्या सरकार इन संकेतों को सुधार के अवसर के रूप में लेगी, या ये सब यूं ही चलता रहेगा?
लोकतंत्र की असली पहचान केवल चुनावों से नहीं होती। उसकी आत्मा उन संस्थाओं में बसती है जो कानून और नागरिकों के बीच सेतु का काम करती हैं। पुलिस ऐसी ही एक संस्था है। लेकिन जब वही संस्था लोगों के मन में सुरक्षा की जगह भय पैदा करने लगे, तो भरोसे की नींव हिलने लगती है।
सीसीटीवी ‘खराब’ होना महज़ संयोग नहीं
अदालत ने पुलिस थानों में लगे सीसीटीवी कैमरों को लेकर भारी नाराज़गी जताई। जब भी हिरासत में मारपीट या बदसलूकी की शिकायत आती है, कैमरे अक्सर उसी समय “खराब” पाए जाते हैं। क्या यह महज़ तकनीकी खराबी है, या एक खतरनाक पैटर्न? लखनऊ पीठ ने इस मामले की जांच के आदेश दिए और स्पष्ट कहा कि इसे सामान्य घटना मानकर टालना न्याय से मुंह मोड़ने जैसा होगा। अगर थानों के भीतर पारदर्शिता नहीं होगी, तो न्याय की रोशनी बाहर कैसे पहुंचेगी? अंधेरे में खड़ा तंत्र नागरिकों का विश्वास नहीं जीत सकता।
‘एनकाउंटर’ और ‘लंगड़ा’ बनाने का शॉर्टकट
अदालत ने तथाकथित “एनकाउंटर संस्कृति” पर भी तीखी टिप्पणी की। न्यायमूर्ति ने साफ़ कहा कि सज़ा देने का अधिकार न्यायपालिका का है, पुलिस का नहीं। हर मुठभेड़ की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच अनिवार्य होनी चाहिए। यह भी सवाल उठा कि आरोपियों को पैर में गोली मारकर “लंगड़ा” बना देना क्या कानून सम्मत प्रक्रिया है, या फिर यह पदोन्नति और वाहवाही पाने का शॉर्टकट? न्याय की प्रक्रिया भावनाओं या लोकप्रियता से नहीं, नियमों और संवैधानिक मर्यादाओं से चलती है।
‘पुलिस राज्य’ की आहट
अदालत ने यह चेतावनी भी दी कि यदि पुलिस न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करे या मजिस्ट्रेटों पर दबाव बनाए, तो हालात “पुलिस राज्य” की ओर बढ़ सकते हैं। लोकतंत्र में शक्तियों का संतुलन अनिवार्य है। अगर एक संस्था अपने दायरे से बाहर जाकर दूसरों पर हावी होने लगे, तो व्यवस्था का संतुलन डगमगाने लगता है। गैरकानूनी गिरफ्तारियों का मुद्दा भी कम गंभीर नहीं है। गिरफ्तारी के कारण न बताना या कानूनी प्रक्रिया का पालन न करना संविधान के अनुच्छेद 21 का सीधा उल्लंघन है।
औपनिवेशिक मानसिकता और सुधार की ज़रूरत
समस्या कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं है; यह ढांचे की जड़ में बैठी हुई है। 1861 का पुलिस कानून उस दौर की देन है जब मक़सद जनता की सेवा नहीं, बल्कि हुकूमत की पकड़ मज़बूत करना था। दुर्भाग्य से आज भी उस मानसिकता की छाया दिखाई देती है। गांवों और छोटे कस्बों में अक्सर यह धारणा बन जाती है कि एक मामूली अफसर ही इलाके का “बादशाह” है। गरीब और कमजोर तबका थाने जाने से कतराता है, जबकि रसूखदार लोगों के लिए रास्ते आसान हो जाते हैं।
निष्कर्ष: विश्वास ही असली शक्ति
पुलिस और फ़ौज के किरदार में मौलिक अंतर होता है। फ़ौज बाहरी दुश्मन से लड़ती है, जबकि पुलिस अपने ही समाज के बीच काम करती है। इसलिए उससे संयम, धैर्य और इंसानियत की अपेक्षा होती है। अगर हर विरोध प्रदर्शन को दुश्मनी की नज़र से देखा जाएगा, तो लोकतंत्र की आत्मा जख्मी होगी।
सुधार केवल संसाधन बढ़ाने से नहीं आएगा। इसके लिए सोच और व्यवस्था दोनों में बदलाव जरूरी है। थानों को डर का प्रतीक नहीं, भरोसे का केंद्र बनाना होगा। लोकतंत्र में पुलिस की असली शक्ति उसकी वर्दी नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है। अगर यह विश्वास टूट जाए, तो कानून का ढांचा केवल कागज़ी रह जाता है।
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Thakur Pawan Singh
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