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Editorial Desk, Taj News आलेख: शमिक लाहिड़ी | अनुवाद: संजय पराते | Updated: Fri, 13 Feb 2026

“पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव करीब हैं। जो लोग कभी CPI(M) को अप्रासंगिक मानते थे, आज उन्हें उसकी मौजूदगी का सामना करना पड़ रहा है। टीएमसी-भाजपा की राजनीति, एसआईआर (SIR) और वामपंथी विकल्प पर माकपा नेता शमिक लाहिड़ी का यह विशेष आलेख कई भ्रम तोड़ता है।”

Shamik Lahiri CPIM Taj News

शमिक लाहिड़ी

(लेखक)

केंद्रीय समिति सदस्य, माकपा एवं संपादक ‘गणशक्ति’

Sanjay Parate Translator Taj News

संजय पराते

(अनुवादक)

उपाध्यक्ष, छत्तीसगढ़ किसान सभा (AIKS)

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पास आ रहे हैं। वामपंथी पार्टियों, खासकर सीपीआई(एम) [CPI(M)] पर मीडिया की कड़ी नज़र है, जिससे उनकी मौजूदा राजनीतिक स्थिति के बारे में कई सवाल उठ रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जो लोग कभी सीपीआई(एम) को अप्रासंगिक मानते हुए खारिज करते थे, अब उन्हें उसकी मौजूदगी का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी की गतिविधियों को नज़रअंदाज़ नहीं कर पाने के कारण, वे विवादित मुद्दे उठाकर जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए, इनमें से उनकी कुछ चिंताओं पर सीधे तौर पर बात करना ज़रूरी है।

एसआईआर (SIR) पर रुख: सरासर झूठ और ‘दोहरा-लाभ घोटाला’

एक अहम सवाल यह है: पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर सीपीआई(एम) का अधिकृत रुख क्या है? क्या हमने टीएमसी का अंध-विरोध करने के कारण एसआईआर को खुला समर्थन दिया? बिल्कुल नहीं। यह सरासर झूठ है।

हमारी पार्टी ने पहले दिन से कहा है कि चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल में ‘एसआईआर’ की रट लगाकर एक खतरनाक काम कर रहा है। चुनाव आयोग के पास नागरिकता तय करने का कोई अधिकार नहीं है। अगर उसे शक है, तो 76 लाख मतदाताओं को परेशान करने के बजाय गृह मंत्रालय से सलाह लेनी चाहिए। ‘घुसपैठियों’ का शोर मचाया जाता है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि बंगाल में लाखों लोगों को अपनी मौजूदगी साबित करने के लिए पुरानी ज़मीन की डीड के लिए हाथ-पैर मारने पड़ रहे हैं। प्रवासी मज़दूर हज़ारों रुपये खर्च कर दूसरी सुनवाई के लिए आ रहे हैं, जिससे चुनाव से पहले घबराहट फैल रही है।

“ईमानदारी से सोचें कि भारत में ‘विदेशियों’ की खोज करने का क्या मतलब है? हड़प्पा से लेकर आज तक, भारत एक सम्मिश्रण वाला क्षेत्र है। धर्म के आधार पर लोगों को बाहरी कहना इतिहास को नजरअंदाज करना है।”

इसके पीछे एक “दोहरा-लाभ घोटाला” छिपा है। जहाँ गरीबों को कभी खत्म न होने वाली सुनवाई का सामना करना पड़ रहा है, वहीं टीएमसी-भाजपा का गठबंधन खास इलाकों में “नकली वोटरों” को चुपचाप बचाता है। उदाहरण के लिए, मुख्यमंत्री के भतीजे के लोकसभा क्षेत्र में फाल्टा और डायमंड हार्बर में सिर्फ़ 13,000 से 17,000 नाम हटाए गए, जबकि अन्य जगहों पर 30,000 तक। फाल्टा में तृणमूल ने फ़ॉर्म जमा करने पर एकाधिकार कर लिया। चुनाव आयुक्त कहते हैं कि ‘मैं गैर-नागरिकों को हटा दूंगा।’ लेकिन आप उन्हें पहचानने वाले कौन होते हैं? यह शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) का उल्लंघन है।

सच्चाई से परे की राजनीति (Post-Truth Politics)

यह नैरेटिव बनाया जा रहा है कि बंगालियों का एक बड़ा तबका भाजपा को सत्ता में नहीं देखना चाहता, इसलिए वे मजबूरी में तृणमूल को वोट दे रहे हैं। इसे ‘कम बुराई’ (Lesser Evil) का सिद्धांत कहा जाता है। यानी भ्रष्टाचार, लूटपाट, आरजी कर (RG Kar) अस्पताल में डॉक्टर से रेप-मर्डर, शिक्षक भर्ती घोटाले के बावजूद लोग सोचते हैं कि वामपंथ को वोट देना बेकार है।

यह बहस पूरी तरह से मीडिया की बनाई हुई है। 2016 में वामपंथ-कांग्रेस ने 66 सीटें जीती थीं और भाजपा ने सिर्फ 3, फिर भी मीडिया ने भाजपा को ही मुख्य ताकत बताया। आज के दौर में इसे ‘सच्चाई से परे’ (Post-Truth) कहा जाता है। सच तो यह है कि भाजपा की सफलता टीएमसी के सत्ता में रहने के दौरान ही हुई है। राज्य भाजपा असल में टीएमसी का “ओल्ड बॉयज़ क्लब” है, जिसके ज़्यादातर नेता पुराने तृणमूल सदस्य हैं।

राजनीति का कॉर्पोरेटीकरण और मीडिया पर कब्ज़ा

आई-पीएसी (I-PAC) ऑफिस की छापामारी दिखाती है कि टीएमसी ने चुनाव प्रक्रिया का कॉर्पोरेटीकरण कर दिया है। पार्टियां चलाने के लिए कंपनियां नहीं होतीं। इसी व्यावसायीकरण का नतीजा है कि गरीब रहने वाले पार्षद आज लग्ज़री कारों में घूम रहे हैं। इसके साथ ही मुख्यधारा की मीडिया की आज़ादी से समझौता हुआ है। सोशल मीडिया को भी एल्गोरिदम के ज़रिए नियंत्रित किया जा रहा है, जैसा कि फेसबुक और अंखी दास के विवाद में सामने आया था (जिनके ससुर टीएमसी के पूर्व मंत्री थे)।

हम सोशल मीडिया पर भी हैं और सड़कों पर भी। हम ‘नेट’ पर भी हैं और ‘पैरों’ पर भी (Online and on the ground)।

वामपंथ की जरूरत किसको है?

विधानसभा से वामपंथ की गैर-मौजूदगी पर ज़ोर देना एक सोची-समझी रणनीति है। असली सवाल यह है कि क्या वामपंथ के बिना आम आदमी को फ़ायदा हुआ? अगर हम संसद या विधानसभा में मज़बूत होते, तो क्या राष्ट्रीय संपत्तियों की अंधाधुंध लूट, बड़े पैमाने पर निजीकरण और बंगाल में बेलगाम भ्रष्टाचार हो पाता? हमने अपने 34 साल के शासन में कुछ गलतियां कीं, जिनसे हमने सीखा है, लेकिन आज वामपंथ की कमी जनता को साफ़ महसूस हो रही है।

दीवार लेखन या झंडा लगाने पर शहादत देनी पड़ रही है— यह स्थिति फासीवादी राज्यों से भी बदतर है। ‘दीदी’ और मोदी दोनों मुसोलिनी और हिटलर के आदर्शों पर चलकर शासन चलाने की कोशिश कर रहे हैं।

🚩 असली वामपंथी विकल्प क्या है?

उनके लिए विकल्प सिर्फ मंदिर और मस्जिद के बीच चुनना है। हमारा विकल्प है: किसानों को फसल की सही कीमत, 14,000 सहकारिताओं को पुनर्जीवित करना, 8,000 बंद पड़े सरकारी स्कूलों को फिर से खोलना और स्वास्थ्य सुविधाएं बहाल करना। वोट के लिए 710 एकड़ में मंदिर बनाने के बजाय, हम उद्योग लगाएंगे ताकि युवाओं को काम मिले। मोदी बेरोज़गारों से कहते हैं “पकौड़े तलो,” और दीदी कहती हैं “चॉप्स तलो।” भाजपा और टीएमसी एक-दूसरे के पूरक हैं; हम ही असली विकल्प हैं।

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