ग्रामीण भारत की नई तस्वीर: इंटरनेट, मोबाइल क्रांति और सड़क कनेक्टिविटी ने बदल दिया देहात का स्वरूप

Sat, 29 Nov 2025 06:42 PM IST, New Delhi, India.

अंकित रिपोर्ट: बृज खंडेलवाल

हौले हौले इंटरनेट टेक्नोलॉजी, मोबाइल क्रांति, रोड कनेक्टिविटी से ग्रामीण भारत बदल रहा है।



मध्य प्रदेश के एक गांव में, भोर की हल्की रोशनी में धान के खेतों पर फैली धुंध को चीरते हुए एक मोटरसाइकिल गुजरती है। पीछे बैठी किशोरी मोबाइल पर ऑनलाइन गाने सुन रही है—उसके कानों में इयरफोन, और उसके रोड किनारे गांव में अभी-अभी लगा नया 4G टॉवर। उधर नए घर के आँगन में बुज़ुर्ग रामप्रसाद नल से सीधे बहते साफ पानी से बचे खुचे दांतों पर टूथ पेस्ट रगड़ रहे हैं ; उसकी पत्नी पूछ रही है—“ब्रेड पे मक्खन लगाऊं या टमाटर सौंठ!” खेत की मेड़ पर लगे सोलर लैंप अभी बुझकर सोये भी नहीं कि बिजली विभाग की वैन नई लाइन की मरम्मत के लिए आ चुकी है। उधर, केरल की वायनाड जिले में झील से लगे गांव में स्कूल बस के इंतेज़ार में टाई और ब्लेजर पहने स्टूडेंट्स खड़े हैं। एक के हाथ में क्रिकेट bat है, दूसरे के हाथ में फुटबॉल, सबके एक ही सपने हैं: एक बेहतर भविष्य।

बृज खंडेलवाल
बृज खंडेलवाल


यह वही ग्रामीण भारत है, जिसे कभी “an area of darkness,” कहा गया था, भुखमरी और गरीबी सत्यजीत राय जैसे डायरेक्टर्स की फिल्मों की थीम होती थी। रूरल इंडिया, धूल-धक्कड़, अंधकार और दूरी का प्रतीक माना जाता था। आज गाँव नई शक्ल ले रहे हैं—ऐसी तस्वीर जिसकी कल्पना करना भी कभी मुश्किल था।
पिछले एक दशक में ग्रामीण जीवन काफी बदला है। हालांकि परिवर्तन की रफ्तार सुस्त है। 2014 से 2025 तक का यह दशक सिर्फ सरकारी योजनाओं की सूची नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज के गहरे, जीवंत और मानवीय परिवर्तन की कहानी है—एक बदलाव जो आँकड़ों से आगे जाकर लोगों के चेहरों, सपनों और जीवनशैली में दिखाई दे रहा है।
2014 से पहले 29.17% ग्रामीण भारत बहुआयामी गरीबी में जकड़ा था। 2025 में यह घटकर 11.28% पर आ गई—यानी 24.82 करोड़ लोग गरीबी के बोझ से मुक्त हुए। यह परिवर्तन खेत-खलिहान और आँगन-चौपाल तक में महसूस किया जा सकता है।
एक समय था जब बारिश में गाँव की सड़कें कीचड़ में गायब हो जाती थीं। बाज़ार तक पहुँचना आधा दिन का काम था। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ने इस बाधा को तोड़ा—2014 से 2024 के बीच 7.5 लाख किमी से अधिक सड़कें बनीं।
अब दूध बेचने वाले किसान उसी दिन शहर लौट आते हैं, और बच्चों की एम्बुलेंस गाड़ी गांव तक रुकावट के बिना पहुँचती है। आर्थिक गतिविधियां 20–30% बढ़ीं—यह सिर्फ आँकड़ा नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की जिंदगी की चौंकाने वाली हकीकत है।
2014 में ग्रामीण घरों में औसतन 12.5 घंटे बिजली आती थी। 2023 तक यह बढ़कर 21.9 घंटे हो गई।2.86 करोड़ ग्रामीण घरों को पहली बार कनेक्शन मिला। यह सिर्फ एक बल्ब का उजाला नहीं—यह सिलाई मशीन चलने का मौका है, रात में बच्चों के पढ़ने का समय है, और छोटे व्यवसायों के लिए नई शुरुआत है।
2019 से पहले सिर्फ 17% ग्रामीण घरों में नल का पानी था। 2025 में यह आंकड़ा 81% तक पहुंच गया—12.31 करोड़ नए कनेक्शन। अब महिलाएं 2–3 घंटे रोज़ पानी ढोने में नहीं लगातीं; उन घंटों में वे काम करती हैं, पढ़ती हैं, या बस आराम करती हैं—जितने हक से शहर की महिलाएं करती हैं।
डिजिटल ग्रामीण भारत: स्मार्टफोन अब सिर्फ शहर की चीज़ नहीं। चाय की दुकान पर जुटे युवक अब क्रिकेट स्कोर के साथ गेहूं-धान के MSP भी ऑनलाइन चेक करते हैं। 2015 में 20% इंटरनेट पेनेट्रेशन था, 2025 में यह 55.3% हो गया—ग्रामीण भारत के पास आज 39.8 करोड़ इंटरनेट यूजर हैं। भारतनेट ने 2.18 लाख ग्राम पंचायतों को हाई-स्पीड इंटरनेट से जोड़ा।
डीबीटी ने भ्रष्टाचार की लीक रोक दी—1.3 लाख करोड़ रुपये की बचत, मनरेगा मजदूरी सीधे खाते में। रोज़गार स्थिर हुआ, मजदूरी दरें हर साल बढ़ीं, और डिजिटल भुगतान गांव में आम हो गए।

फसल बीमा योजना ने किसानों के भाग्य की दिशा बदल दी। 2016 से 2025 के बीच 50 करोड़ किसान 1.4 लाख करोड़ रुपये का क्लेम पा चुके हैं। उन्नत बीज, बेहतर खाद, दो गुनी एक्सटेंशन सेवाओं ने उत्पादकता 10–15% तक बढ़ा दी। अब किसान मौसम पूर्वानुमान मोबाइल पर देख कर बोआई कर रहे हैं—गांव में तकनीक पहली बार बराबरी का अवसर दे रही है।
महिलाओं का उदय: चूल्हे का धुआँ खत्म, सपनों की उड़ान शुरू। उज्ज्वला के 10 करोड़ LPG कनेक्शन ने महिलाओं के फेफड़ों से धुआँ हटाया और जीवन में फुर्सत जोड़ी।
बाल लिंगानुपात 918 से 929 हुआ। लड़कियों का माध्यमिक नामांकन 81% से बढ़कर 95%, यानी एक सामाजिक क्रांति की शुरुआत हुई।
सुकन्या समृद्धि, बीबीबीपी और लक्षित योजनाओं ने महिलाओं को पहली बार आर्थिक शक्ति दी है।
कोविड के बाद 4 करोड़ प्रवासी गांव लौटे। रेमिटेंस 20% बढ़ा। यह पैसा गांवों में घर बनाने, शिक्षा और कृषि उपकरणों में लगा—उपभोग 15% बढ़ा और गांव स्थानीय अर्थव्यवस्था का इंजन बन गए।
2014 से पहले का ग्रामीण भारत—बिजली 60%, पानी 17%, इंटरनेट लगभग शून्य, गरीबी 29%।
2025 का ग्रामीण भारत—बिजली 99%, पानी 81%, डिजिटल 55%, गरीबी 11% के नीचे।
आज गांव की शामें सोलर लाइट की रौशनी में चमकती हैं। नल से बहता पानी, चमकती सड़कों पर दौड़ती बाइकें, इंटरनेट से जुड़े युवा, और शौचालयों से आई स्वच्छता—यह सब मिलकर ग्रामीण भारत की नई पहचान गढ़ रहे हैं।
धीमा, कहीं ज्यादा, कहीं कम, ये परिवर्तन एक सामाजिक पुनर्जन्म की कहानी है जिसमें गांव का हर घर, हर खेत, और हर परिवार नई शुरुआत की पहल कर रहा है। और इंटरनेट क्रांति, सोने पे सुहागा!!

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