ऑनलाइन गेम का घातक टास्क: पिता को ‘एनिमी’ मान बेटे ने रात में गर्दन पर रखा चाकू, नींद खुलने से बची जान

National Desk, Taj News | ठाकुर पवन सिंह | Friday, 6 February 2026, 09:15 AM IST

हरियाणा के कैथल से ऑनलाइन गेमिंग की लत से जुड़ा एक चौंकाने वाला और भयावह मामला सामने आया है। एक किशोर ने एक हिंसक ऑनलाइन गेम का टास्क पूरा करने के लिए आधी रात को अपने सोते हुए पिता की गर्दन पर चाकू रख दिया। गनीमत रही कि पिता की नींद उसी समय खुल गई और उन्होंने बचाव कर लिया, नहीं तो एक बड़ा हादसा हो सकता था। मनोचिकित्सकों के अनुसार, गेम की लत ने बच्चे की सोच को इस हद तक विकृत कर दिया था कि उसे अपने ही पिता दुश्मन नजर आने लगे। यह घटना ऑनलाइन गेमिंग की बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति और उसके घातक मानसिक प्रभावों पर एक गंभीर सवाल खड़ा करती है।

HIGHLIGHTS
  1. कैथल में ऑनलाइन गेम का टास्क पूरा करने के लिए बेटे ने सोते हुए पिता की गर्दन पर चाकू रख दिया।
  2. पिता के नींद खुलने से बच गई जान; गेम ने बच्चे को पिता को दुश्मन के रूप में देखना सिखाया।
  3. मनोचिकित्सकों ने बताया घरेलू हिंसा और गेम की लत का मिला-जुला था नकारात्मक असर
  4. कैथल नागरिक अस्पताल में एक साल से स्थायी मनोचिकित्सक नहीं, गंभीर स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी उजागर।

गेम का टास्क था: ‘रात में पिता की गर्दन पर चाकू रखो’

मामला करनाल के बल्ला गांव का है, जहां के एक परिवार ने अपने बेटे के असामान्य व्यवहार को देखते हुए उसे कैथल के नागरिक अस्पताल के मनोरोग विभाग में इलाज के लिए लाया। डॉक्टर विनय गुप्ता, मॉनिटरिंग एंड इवैल्यूएशन ऑफिसर, ने बताया कि किशोर एक ऐसे गेम का आदी हो चुका था जहां अगले स्तर पर पहुंचने के लिए हिंसक टास्क दिए जाते हैं। काउंसलिंग के दौरान खुलासा हुआ कि बच्चे को गेम में एक टास्क मिला था: “रात के समय अपने पिता की गर्दन पर चाकू रखना है।” इसी टास्क को पूरा करने के लिए किशोर ने आधी रात को उठकर अपने सोते हुए पिता के गले पर चाकू तान दिया। सिर्फ इसलिए एक हत्या होने से बच गई क्योंकि पिता की नींद उसी क्षण खुल गई।

घरेलू हिंसा और गेम का जहरीला मेल: बच्चे की मानसिकता बनी ‘वर्चुअल रियलिटी’

डॉक्टरों ने जांच में पाया कि इस घटना के पीछे सिर्फ गेम की लत ही नहीं, बल्कि घर का माहौल भी एक प्रमुख कारण था। काउंसलिंग के दौरान यह सामने आया कि बच्चे के माता-पिता के बीच अक्सर घरेलू हिंसा की घटनाएं होती थीं। इस नकारात्मक माहौल और गेम में मिलने वाली लगातार हिंसक उत्तेजना ने बच्चे की मानसिकता को पूरी तरह बदल दिया। वह वास्तविक दुनिया और वर्चुअल दुनिया के बीच का फर्क भूलने लगा और गेम में दिए गए हिंसक टास्क को पूरा करने के लिए अपने ही परिवार को निशाना बनाने लगा।

‘डोपामाइन’ का खतरनाक खेल: वर्चुअल रिवॉर्ड्स बना रहे बच्चों को अपराधी

मनोचिकित्सकों ने इस मामले में एक गंभीर तंत्र की ओर इशारा किया। डॉ. विनय गुप्ता के अनुसार, ऐसे हिंसक गेम्स बच्चों के दिमाग में ‘डोपामाइन’ नामक केमिकल का स्तर अचानक बढ़ा देते हैं, जिसे ‘फील-गुड हार्मोन’ भी कहा जाता है। गेम में हथियार खरीदने, करैक्टर को अपग्रेड करने या नए लेवल तक पहुंचने पर मिलने वाले वर्चुअल रिवॉर्ड्स इस हार्मोन को उत्तेजित करते हैं। नतीजा यह होता है कि बच्चा उस रिवॉर्ड को पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता है, चाहे उसके लिए उसे वास्तविक दुनिया में चोरी करनी पड़े या हिंसा। उसे सही और गलत का फर्क समझ नहीं आता।

स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता: अस्पताल में एक साल से नहीं है स्थायी मनोचिकित्सक

इस गंभीर मामले ने स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बड़ी कमी को भी उजागर किया है। कैथल के नागरिक अस्पताल में लगभग एक साल से कोई स्थायी मनोचिकित्सक तैनात नहीं है। ऐसे गंभीर मामलों का इलाज पूरी तरह से काउंसलर्स के भरोसे चल रहा है। जिन मरीजों को दवाइयों या विशेष उपचार की जरूरत होती है, उन्हें रोहतक के पीजीआई या अन्य बड़े अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। यह कमी उन गरीब परिवारों के लिए एक बड़ी मुसीबत है, जो निजी इलाज का खर्च वहन नहीं कर सकते।

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✍️ संपादन: ठाकुर पवन सिंह
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